शनिवार 29 नवंबर 2025 - 14:43
आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अब्दुलहुसैन शरफुद्दीन मूसवी र.ह.

हौज़ा / आलिम, फ़क़ीह और मुजाहिद आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अब्दुल हुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी आमिली र०ह० 1290 हिजरी में काज़मैन इराक़ में पैदा हुए। आपके पिता जनाब सय्यद यूसुफ़ शरफ़ुद्दीन र०ह० और आपकी माता आयतुल्लाह सय्यद हादी सद्र र०ह० की बेटी जनाब ज़हरा सद्र र०ह० थीं। जब आप एक वर्ष के हुए तो अपने पिता के साथ नजफ़-ए-अशरफ़ चले गए।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,आलिम, फ़क़ीह और मुजाहिद आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अब्दुल हुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी आमिली र०ह० 1290 हिजरी में काज़मैन इराक़ में पैदा हुए। आपके पिता जनाब सय्यद यूसुफ़ शरफ़ुद्दीन र०ह० और आपकी माता आयतुल्लाह सय्यद हादी सद्र र०ह० की बेटी जनाब ज़हरा सद्र र०ह० थीं। जब आप एक वर्ष के हुए तो अपने पिता के साथ नजफ़-ए-अशरफ़ चले गए।

वह ‘बाब-ए-मदीनतुल-इल्म’ हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के शहर में, दींदार और विद्वान माता-पिता की निगरानी में पले-बढ़े। 6 वर्ष की आयु में स्कूल गए और केवल एक वर्ष बाद, यानी 7 वर्ष की उम्र में, क़ुरआन करीम की ऐसी दिलनशीं तिलावत करते थे कि सुनने वाले सहज ही समझ जाते कि यह बच्चा ‘नोक-ए-नेज़ा के बेनज़ीर क़ारी हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का सच्चा शिया और चाहने वाला है।

वह नजफ़ अशरफ़ से अपने पिता के साथ अपने पैतृक वतन ‘जबल ए आमिल’ आए और 8 वर्ष की उम्र में उनकी औपचारिक शिक्षा का पूरा क्रम शुरू हुआ, जिसमें प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने पिता से प्राप्त की।"

17 वर्ष की आयु में उनकी शादी उनके चाचा की बेटी से हुई। और 20 वर्ष की आयु में, यानी 1310 हिजरी में अपने नाना आयतुल्लाह अल-उज़मा सय्यद हादी सद्र र०ह० की हिदायत पर उच्च धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह सामर्रा इराक़ चले गए। सामर्रा आए उनको अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि मरजा ए आली क़द्र आयतुल्लाहिल-उज़मा मीरज़ा मुहम्मद हसन शीराज़ी र०ह० सामर्रा से नजफ़ अशरफ़ चले गए। उनकी पैरवी करते हुए ज्यादातर उलमा और तुल्लाब भी नजफ़ चले गए, इसलिए आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अब्दुल-हुसैन शरफुद्दीन र०अ० भी नजफ़ अशरफ़ पहुँच गए।

आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफुद्दीन र०ह० ने आयतुल्लाह शेख हसन कर्बलायी र०ह०, आयतुल्लाह शेख मोहम्मद ताहा र०ह०, आयतुल्लाह आख़ुंद मुल्ला काज़िम ख़ुरासानी र०ह०, आयतुल्लाह सय्यद मुहम्मद काज़िम यज़्दी र०ह०, आयतुल्लाह सय्यद इस्माईल सद्र र०ह०, आयतुल्लाह शेख फ़त्हुल्लाह शरीयत अस्फ़हानी र०अ० और आयतुल्लाह सय्यद हसन सद्र र०ह० से इल्म और तर्बियत प्राप्त किया, और 32 वर्ष की आयु में आप दरजा-ए-इज्तेहाद पर फ़ायेज़ हुए।

विभिन्न उलमा और फ़ुक़हा से इज्तेहाद की सनद हासिल करने के बाद आप अपने वतन जबल आमिल लौट आए और अपने वालिद ए माजिद और अपने सम्मानित भाई की मदद से जबल आमिल में हौज़ा-ए-इल्मिया की स्थापना की। लेकिन कुछ ही समय बीता था कि आपके पिता का इंतकाल हो गया और इसके कुछ ही दिनों बाद आपके भाई का भी देहांत हो गया।

नैतिक (अख़्लाक़ी) मतभेद, ज्ञान की प्रतिष्ठा के ख़िलाफ़ है। और उलमा ए रब्बानी का इतिहास गवाह है कि वे हमेशा नैतिक टकरावों और व्यक्तिगत विवादों से दूर रहे हैं। हाँ, इल्मी, वैज्ञानिक, विद्वतापूर्ण और वैचारिक मतभेद हमेशा रहे हैं, और इन्हीं मतभेदों ने देश और समाज की निर्माण व तरक़्क़ी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी र०ह० के भी अपने समकालीन उलमा (विद्वानों) से विचारों में मतभेद रहे, लेकिन उन्होंने कभी भी इन वैचारिक मतभेदों को बदअख़लाक़ी (अनुचित व्यवहार) का रूप नहीं लेने दिया। और अगर किसी ने उनकी समर्थन में भी सीमा से आगे बढ़कर ऐसा किया, तो स्वयं उन्होंने उसका विरोध किया।

इस्लामी एकता और विभिन्न इस्लामी फ़िरकों के बीच एकता और निकटता के लिए आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मुसवी र०ह० की कोशिशें क़ाबिल-ए-क़द्र ही नहीं, बल्कि बुनियादी और बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने मिस्र की यात्रा की और वहाँ के उलमा (विद्वानों) से मुलाकातें कीं। उन्हों ने जामिअतुल-अज़हर के मुफ़्ती शैख़ सलीम अल-बशरी अल-मालिकी से विशेष मुलाक़ात की। इमामत के विषय पर 112 चिट्ठियां एक दूसरे को भेजी, जो बाद में "अल-मुराजेआत" नामी किताब की शक्ल में प्रकाशित हुई.

आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मुसवी र०ह० की किताब "अल-मुराजेआत" उस समय से लेकर आज तक इमामत के विषय को समझने और हिदायत पाने के लिए एक रौशन चेराग़ और मार्गदर्शक मानी जाती है۔ बड़े-बड़े उलमा (विद्वानों) ने इस अज़ीम किताब की तारीफ और सराहना की है।

हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के संस्थापक आयतुल्लाहिल-उज़मा शेख अब्दुलकरीम र०ह०, मरजा-ए-आलीक़द्र आयतुल्लाहिल-उज़मा बुरुजर्दी र०ह०, उस्तादुल फ़ुक़्हा वल-मुज्तहिदीन आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अबुलक़ासिम ख़ूई र०ह०, रहबर-ए-कबीर-ए-इंक़लाब इमाम खुमैनी क़ुद्दिस सिर्रहू, और साहिबे किताब "अल-ग़दीर" अल्लामा अब्दुल हुसैन अमीनी र०ह० ने आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यिद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी र०ह० और उनकी किताबों खासतौर से "अल-मुराजेआत" और "अल-फ़ुसूलिल-मुहिम्माह" की भरपूर प्रशंसा और सराहना की है।

इसी तरह "अल-मुराजेआत" को पढ़कर बहुत से लोगों को हिदायत मिली, जिनमें अल्लामा डॉ. तेजानी सामावी हफ़िज़हुल्लाह और जनाब अब्दुलहफ़ीज़ बनानी के नाम सब से प्रमुख हैं।

जब आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी र०ह० हज के लिए गए, तो उनकी मुलाक़ात सऊदी बादशाह अब्दुलअज़ीज़ से हुई। आपने उसे कुरआन-ए-करीम तौहफ़े में दिया। बादशाह अब्दुलअज़ीज़ ने कुरआन की जिल्द को चूमा। इस पर आपने पूछा कि—“यह जिल्द तो बकरी की खाल की बनी है, इसे क्यों चूमा?” बादशाह ने जवाब दिया: “क्योंकि इसके अंदर कुरआन मौजूद है, इसलिए मैंने इसे चूमा।” इस पर आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी र०ह० ने फरमाया: “हम भी रौज़ा-ए-रसूल स०अ०व०अ० की दीवारों, जाली और दरवाज़े को सिर्फ़ इसलिए चूमते हैं कि वहाँ रसूल अल्लाह स०अ०व०अ० मौजूद हैं।” इसके बाद बादशाह ने ज़ायेरों को रौज़ा-ए-रसूल स०अ०व०अ० चूमने से रोकना बंद कर दिया، हालांकि उसके बाद के बादशाहों ने दोबारा पाबंदी लगा दी! इसी तरह आयतुल्लाहिल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी र०ह० ने मस्जिदुलहराम में नमाज़ की इमामत की जिसमें तमाम मज़ाहिब और फिर्क़ों के मुसलमानों ने उनकी इक़्तेदा में नमाज़ पढ़ी!

आयतुल्लाह अल-उज़मा सय्यद अब्दुलहुसैन शरफ़ुद्दीन मूसवी र०ह० ने जहाँ क़ाबिल-ए-क़दर इल्मी, दीनी और मज़हबी खिदमत की वहीं आपकी सियासी कोशिशें भी भुलाए जाने लायक़ नहीं है। फ्रांसीसी इस्तेमार (उपनिवेशवाद) के खेलाफ आपके हुक्मे जिहाद ने इस्लामी दुनिया, ख़ासकर लेबनान को इस्तेमार से निजात दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इसी तरह आपने फिलिस्तीन पर यहूदी क़ब्ज़े के खिलाफ भी आवाज़ उठाई।

आख़िरकार 8 जमादी-उस- सानी 1377 हिजरी को, 87 वर्ष की आयु में यह इल्म और हिदायत का सूरज डूब गया। आपका जनाज़ा लेबनान से नजफ़ अशरफ़ लाया गया और मौला व आक़ा अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम के रौज़े में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

जब आयतुल्लाह अल-उज़मा आक़ा सय्यद रूहुल्लाह मूसवी ख़ुमैनी क़ुद्दिस सिर्रुह को आपके इंतक़ाल की खबर मिली, तो उन्होंने अपने दर्स ए ख़ारिज की छुट्टी की और फ़रमाया: “हमारे ज़माने का हिशाम बिन हकम चला गया।"

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